इंसानियत और हैवानियत कभी मरती नहीं
बस जिन्दा दफन रहती हैं
जिस पर जितनी मिटटी डालो वो उतना ही गहरे दब जाती है
ये हम पर है हम किसे बाहर लाना चाहते हैं
इंसानियत पर से मिटटी उठा कर
हैवानियत पर उसे डाल गहरे दबा सकते हैं
या इसका उल्टा कर सकते हैं
जब भी आप मैं कोई अन्याय होता देख
मुहं फेर के चले जाते हैं तो
एक मुठ्ठी रेत इंसानियत की कब्र पे डाल
उसे और गहरे दबा देते हैं
हैवानियत खड़े हंस रही है
कोई अच्छा कर्म कीजिये
इंसानियत पर से एक मुठ्ठी रेत उठा कर
हैवानियत पर दे मारिये
उसे दफ्न कर दीजिये
फैसला हमारे हाथ है
हम किसे जिन्दा रखना चाहते हैं
बहुत बड़ा कुछ नहीं करना है
बस किसी रोते को हँसाना है
किसी गिरते को सहारा देकर
किसी का हौसला बढाकर
अपना कर्तव्य निभाना है
अपने आसपास से ही ,
छोटी छोटी बातों से शुरू कर
बड़े लक्ष्य की ओर जाना है
अपने अन्दर ही इंसानियत को जगाये रखना है|
